Class 10th Social Science Ka Important Question

Class 10th Social Science Ka Important Question 2024 | Matric SST ka VVI Subjective Question 2024

Social Science

Class 10th Social Science Ka Important Question 2024 :- दोस्तों यहां पर बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा 2024 ( Bihar Board Matric Exam 2024 ) के लिए सामाजिक विज्ञान (इतिहास) का सब्जेक्टिव प्रश्न उत्तर दिया गया है यदि आप लोग मैट्रिक परीक्षा 2024 की तैयारी कर रहे हैं तो कक्षा 10 व्यापार और भूमण्डलीकरण का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न( class 10th vyapar aur bhumandalikaran dirgh uttariy prashn ) यहां पर किया गया है जो कि आने वाले परीक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है साथ ही इस वेबसाइट पर सभी सब्जेक्ट का ऑब्जेक्टिव एंड सब्जेक्टिव प्रश्न( Bihar Board Class 10th All Subjective Ka Objective And Subjective Question 2024 ) दिया गया है जिससे आप 2024 में बेहतर तैयारी कर सकते हैं

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Class 10th Social Science Ka Important Question 2024

प्रश्न 1. भूमण्डलीकरण के कारण आम लोगों के जीवन में आने वाले परिवर्तन की चर्चा करें।

उत्तर ⇒  वर्तमान परिदृश्य में भूमण्डलीकरण के प्रभाव को आर्थिक क्षेत्र में अधिक स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। मुक्त बाजार, मुक्त व्यापार, खुली प्रतियोगिता, बहुराष्ट्रीय निगमों का प्रसार, उद्योग तथा सेवा क्षेत्र का निजीकरण उक्त आर्थिक भूमण्डलीकरण के मुख्य तत्त्व हैं। अर्थव्यवस्था की शक्ति को स्थापित करने में भूमण्डलीकरण के आर्थिक स्वरूप का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

भूमण्डलीकरण का प्रभाव आम जीवन पर स्पष्ट दिख रहा है। भूमण्डलीकरण के कारण जीविकोपार्जन के क्षेत्र का विस्तार तीव्र गति से हुआ है जिससे जीविकोपार्जन के कई नए क्षेत्र खुले हैं। सेवा क्षेत्र से तात्पर्य वैसी आर्थिक गतिविधियों से है जिनमें लोगों से विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ प्रदान करने के बदले पैसा लिया जाता है, जैसे यातायात की सुविधा, बैंक और बीमा क्षेत्र में दी जाने वाली सुविधा, दूर संचार और सूचना तकनीक (मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, इंटरनेट), होटल और रेस्टोरेंट आदि । उपर्युक्त वर्णित सभी क्षेत्र भूमण्डलीकरण के दौरान काफी तेजी से फैला है, जिससे लोगों को जीविकोपार्जन के कई नवीन अवसर मिले हैं। आर्थिक भूमण्डलीकरण ने हमारी आवश्यकताओं के दायरे को और बढ़ाया है। उसकी पूर्ति हेतु नए-नए सेवाओं का उदय हो रहा है, जिससे जुड़कर लाखों लोग अपनी जीविका चला रहे हैं। इस प्रक्रिया ने लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा किया है।

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भूमण्डलीकरण के कारण पर्यटन के क्षेत्र में काफी रोजगार बढ़ा है। टूर एवं ट्रेवल्स एजेंसी रेस्टोरेंट, रेस्ट हाउस, आवासीय होटल, कूरियर सेवा एवं IT क्षेत्र में रोजगार के अवसर काफी बढ़े हैं। इस प्रकार भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने लोगों के जीवन स्तर को काफी बढ़ाया है।


प्रश्न 2. 1929 ई के आर्थिक संकट के कारण और परिणाम को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ 1929 ई. के आर्थिक संकट का बुनियादी कारण स्वयं इस अर्थव्यवस्था के स्वरूप में समाहित था। प्रथम विश्वयुद्ध के चार वर्षों में यूरोप को छोड़कर बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार होता चला गया, उसके मुनाफे बढ़ते चले गए। दूसरी ओर, अधिकांश लोग गरीबी और अभाव में पिसते रहे। नवीन तकनीकी प्रगति और मुनाफे ने उत्पादन में काफी वृद्धि कर दी। किन्तु, अतिरिक्त उत्पादन के खरीदार बाजार में नहीं थे।

अति उत्पादन के कारण कीमतें काफी गिर गई, जिससे किसानों की आय घट गई। अत: इस स्थिति से उबरने के लिए उन्होंने उत्पादन को और बढ़ाया, ताकि कम कीमत पर ज्यादा माल बेचकर अपना आय स्तर बनाये रख सकें। इससे कीमतें और नीचे चली गई जिसने आर्थिक संकट को जन्म दिया।

अमेरिका द्वारा यूरोपीय देशों के लिए दिए गए ऋण की वापसी की माँग ने आर्थिक संकट को और गहरा दिया। इस मंदी का बुरा प्रभाव अमेरिका को ही झेलना पड़ा। मंदी के कारण बैंकों ने लोगों को कर्ज देना बंद कर दिया और दिए हुए कर्ज की वसूली तेज कर दी। किसान अपनी उपज को बेच नहीं पाने के कारण तबाह हो गए। कर्ज की कमी से कारोबार ठप्प पड़ गया। बैंकों ने लोगों के सामानों, मकान, कार, जरूरी चीजों को कुर्क कर लिया। लोग सड़क पर आ गए। कारोबार ठप्प पहने से बेरोजगारी बढ़ी। कर्ज की वसूली नहीं होने से बैंक बर्बाद हो गए एवं कई कंपनियाँ बंद हो गईं। 1933 ई० तक 4000 से ज्यादा बैंक बंद हो चुके थे और लगभग 110000 कंपनियाँ चौपट हो गई थीं।

अन्य देशों पर होने वाले आर्थिक प्रभावों में जर्मनी और ब्रिटेन इस आर्थिक मंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। महामंदी ने भारतीय व्यापार को प्रभावित किया। 1928 से 1934 ई. के बीच देश का आयात-निर्यात घटकर लगभग आधा रह गया। कृषि उत्पादन की कीमत काफी गिर गई, जिससे भारतीय किसान काफी प्रभावित हुए। सरकार की तरफ से किसानों को कोई रियायत नहीं दी गई। इस मंदी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को आरंभ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।


Matric SST ka VVI Subjective Question 2024

प्रश्न 3. दो महायुद्धों के बीच और 1945 ई के बाद औपनिवेशिक देशों में होने वाले राष्ट्रीय आंदोलन पर एक निबंध लिखें।

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयुद्ध ने मानवीय सभ्यता को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया। दो विश्वयुद्धों के दौरान औपनिवेशिक देशों के अर्थतंत्र का काफी विकास एवं फैलाव हुआ। जैसे, भारत में उस समय कपड़ा, जूट, खनन आदि क्षेत्रों का विकास हुआ। महामंदी ने भारतीय व्यापार को फौरन प्रभावित किया। 1928 से 1934 ई. के बीच आयात-निर्यात लगभग आधी रह गई। कृषि उत्पादों की कीमत यहाँ काफी गिर गई। शहरी लोगों की अपेक्षा गाँव के लोग इस मंदी से ज्यादा प्रभावित हुए। कृषि दाम में कमी के बावजूद अंग्रेजी सरकार लगान की दर कम करने को तैयार नहीं थी, जिससे किसानों में असंतोष की भावना बढ़ी। नगदी फसलों को उपजाने वाले किसानों पर इसका प्रभाव विनाशकारी हुआ, क्योंकि उनका उत्पादन खर्च बहुत अधिक था और उस अनुपात में लाभ नहीं मिलने के कारण वे ऋण के दलदल में फँस गए। इस मंदी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को प्रारंभ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस काल में भारत और अन्य औपनिवेशिक देशों में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार निर्णायक रूप से हुआ, क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उन्हें आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा। दूसरे, उस समय शासक देशों द्वारा किया गया स्वराज का वादा पूरा नहीं किया गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशिया और अफ्रीका के नव स्वतंत्र देशों में एक नवीन आर्थिक संबंध विकसित हुआ। 1947 में भारत की आजादी के बाद इन देशों में स्वतंत्रता की एक लहर पैदा हो गई और अगले 15 वर्षों में लगभग सभी देश आजाद हो गए।


प्रश्न 4. 1945 से 1960 के बीच विश्वस्तर पर विकसित होने वाले आर्थिक संबंधों पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ 1945 से 1960 के दशक के बीच विकसित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता

(i) पहला यह कि 1945 के बाद विश्व में दो भिन्न अर्थव्यवस्था का प्रभाव बढ़ा और दोनों ने विश्वस्तर पर अपने प्रभावों तथा जीतियों का बढ़ाने का प्रयास किया। इस स्थिति से विश्व में एक नवीन आर्थिक और राजनैतिक प्रतिस्पर्धा ने जन्म लिया संपूर्ण विश्व दो ध्रुवों में बँट गया। एक साम्यवादी अर्थतंत्र जिसका नेतृत्व सोवियत रूस ने किया, दूसरा पूँजीवादी अर्थतंत्र जिसका नेतृत्व अमेरिका ने किया।

(ii) दूसरा क्षेत्र पूँजीवादी अर्थतंत्र वाले देशों के बीच बनने वाले अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के विकास का था। यह क्षेत्र पूर्णत: अमेरिका द्वारा संचालित होता था। अमेरिका महादेश के देशों में अमेरिका ने अपनी खुफिया संस्था के • द्वारा प्रभाव जमाया। जबकि पश्चिम मध्य एशिया के देशों पर अपने प्रभाव को अरब बहुल वाले फिलिस्तीन क्षेत्र में इजरायल को स्थापित किया। वस्तुतः अमेरिका यह जानता था कि बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के आधुनिक रूप की रीढ़ तेल और गैस जैसे ऊर्जा स्रोत हैं जिनकी कमी अन्य पूँजीवादी देशों में थी। पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, फ्रांस, पश्चिम जर्मनी, स्पेन) के बीच भी 1945 से 1960 के दशक में महत्त्वपूर्ण आर्थिक सम्बन्धों का विकास हुआ था । इस क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण विशेषता 1945 के बाद यह रही कि विश्व राजनीति और अर्थतंत्र में इन देशों का प्रभाव काफी क्षीण हो गया ।

(iii) तीसरे क्षेत्र में नवीन आर्थिक संबंध विकसित हुए। यह क्षेत्र था एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र देशों का। 1947 में भारत की आजादी के साथ ही इन देशों में स्वतंत्रता की लहर चली और अगले 15 वर्ष में लगभग सभी देश आजाद हो गए। इन देशों पर साम्यवादी एवं पूँजीवादी दोनों अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते थे। चूँकि ये सभी नवस्वतंत्र देश लम्बे औपनिवेशिक शासन के दौरान आर्थिक रूप से बिल्कुल कमजोर हो गए थे और अपनी स्वतंत्रता को बचाए रखने के लिए उन्हें दोनों महाशक्तियों में से किसी एक का समर्थन चाहिए था।


BSEB Class 10th Social Science Ka Important Question 2024

प्रश्न 5. 1919 से 1945 के बीच विकसित होने वाले राजनैतिक और आर्थिक सम्बन्धों पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒  प्रथम महायुद्ध 1918 में समाप्त हुआ। इस युद्ध ने कुछ देशों को खुशहाल बनाया तो किसी-किसी को कंगाल बना दिया। सबसे अधिक आर्थिक हानि तो जर्मनी की हुई वर्साय की साँध में मित्र देशों ने उस पर इतना हर्जाना लगाया कि उसकी कमर टूट गई। आर्थिक के अलावा राजनीतिक रूप से भी वह पंगु बन गया। मित्र देशों के साथ लड़ने वाले इटली की भी हालत कुछ अच्छी नहीं थी विजय के बावजूद उसे कुछ नहीं मिला, जिससे वह राजनीतिक और आर्थिक दोनों रूपों से कुंठित रहने लगा। परिणाम हुआ कि इटली में फासीवाद और जर्मनी में नाजीवाद को बढ़ने से कोई रोक नहीं सका 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति तक फासीवाद तथा नाजीवाद के चलते लोग तबाही में पड़ते रहे।

लेकिन, प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1929 में जो आर्थिक मंदी आई, उसने रूस और फ्रांस को छोड़ सारे विश्व को अपने चपेट में ले लिया। हुआ यह कि युद्ध के चलते युद्ध में संलग्न सभी देश अपने-अपने कारखानों के उपयोगी वस्तुओं को बनाना छोड़ युद्धक हथियार बनाने में लग गए। परिणाम हुआ कि आवश्यक वस्तुओं का बाजार में भारी कमी दिखाई देने लगी। युद्ध के बाद कारखाने अबाध गति से उपभोक्ता वस्तुओं को बनाने लगे। दूसरी ओर बद्ध की समाप्ति के बाद फौज में छँटाई का क्रम जारी रहा। इससे विश्व में बेकारों की एक फौज खड़ी हो गई। कारखानों में सामान तो बने, किन्तु बिके नहीं, इससे स्टॉक जमा हो गया और पूँजी की कमी हो गई। इससे 1929 में भारी आर्थिक मंदी आई। औद्योगिक वस्तुओं के साथ कृषिगत वस्तुओं भी बन्द हो गया। किसी प्रकार अमेरिका के प्रयास से इस मंदी पर काबू पाया गया। सोवियत रूस और जापान इन दो देशों ने भी 1920 से 1929 के बीच आर्थिक क्षेत्र में काफी प्रगति की रूस ने अपनी नई आर्थिक व्यवस्था को विश्व स्तर पर प्रचारित और प्रसारित करने की कोशिश की तो उधर जापान ने अपनी आर्थिक प्रगति को बनाये रखने के लिए साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा को आक्रामक रूप दिया ।

पुनः 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया जो 1944 तक चला। इस युद्ध ने यूरोपीय देशों का कचूमर निकाल दिया। वे इतने कमजोर हो गए कि उनके सभी उपनिवेश एक-एक कर स्वतंत्र हो गए। करें।


Bihar Board Class 10th Social Science Ka Important Question 2024

प्रश्न 6. आधुनिक युग के पूर्व भूमंडलीकरण के इतिहास का वर्णन [15 C]

उत्तर ⇒  भूमंडलीकरण की प्रक्रिया किसी-न-किसी रूप में मानव इतिहास के आरम्भ से ही चल रही है। समय के साथ-साथ उसका स्वरूप बदलता रहा है। कुछ विद्वान भूमंडलीकरण को पूँजीवाद से जोड़कर देखते हैं जिसका उदय आधुनिक काल में हुआ। इस दृष्टि से उसका रिश्ता पूँजीवाद से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दृष्टिकोण से भूमंडलीकरण का उदय 15वीं-16वीं शताब्दी के दौरान माना जा सकता है। 19वीं शताब्दी के मध्य से जब पूँजीवाद विश्वव्यापी व्यवस्था बन गया, भूमंडलीकरण का स्वरूप भी व्यापक होता गया। इस समय पूँजी का निर्यात अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों की एक मुख्य विशेषता बन गई और व्यापार का परिणाम भी काफी बढ़ा।

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर प्रथम महायुद्ध के आरंभ तक काफी तीव्र गति से बढ़ी। इस दौरान माल (वस्तु), पूँजी और श्रम तीनों का अंतर्राष्ट्रीय प्रवाह लगातार बढ़ता गया। इस दौरान इसके अन्तर्गत विकसित नवीन तकनीकों का भी उसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। परन्तु 1914 से 1991 ई. के बीच भूमंडलीकरण की सम्पूर्ण प्रक्रिया प्रायः रुक सी गई। 1929-1930 के बीच की महामंदी ने इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को ही बिल्कुल स्थिर कर दिया तथा व्यापार और पूँजी का प्रवाह बिल्कुल ठहर सा गया। 1991 के बाद जब सोवियत साम्यवादी गुट का विघटन हो गया तो पूँजीवाद की बिल्कुल नवीन अवधारणा का विकास पुनः एक नए स्वरूप के साथ हुआ। 1980 के दशक के बाद दक्षिण अमेरिका के राष्ट्र आर्थिक रूप से काफी जर्जर हो गए थे। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अपनी महत्त्वपूर्ण आर्थिक नीति के रूप में सबसे पहले इस प्रक्रिया को
उन राष्ट्रों में प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे यह सम्पूर्ण विश्व के अर्थतंत्र का आधार स्तम्भ बन गया ।

यद्यपि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया काफी पहले से चली आ रही थी, लेकिन ‘भूमंडलीकरण’ शब्द का सबसे पहले प्रयोग संयुक्त राज्य अमेरिका के जॉन विलियम्सन ने 1990 ई० में किया। इसके प्रभाव को कायम करने में विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) 1995 में अस्तित्व में आया – विश्व व्यापार संगठन (WTO) तथा पूँजीवादी देशों की बड़ी-बड़ी व्यापारिक और औद्योगिक कम्पनियाँ (बहुराष्ट्रीय कम्पनी) का बहुत बड़ा योगदान है । इसके साथ ही अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए गठित क्षेत्रीय संगठनों, जैसे- जी- 8, ओपेक, असियान, यूरोपीय संघ, जी-15, जी – 77, दक्षेस (सार्क) इत्यादि की भी भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही ।


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