Matric History Long Subjective Question Answer 2024

Matric History Long Subjective Question Answer 2024 | Class 10th Social Science Important Subjective Question 2024

Social Science

Matric History Long Subjective Question Answer 2024 :- दोस्तों यहां पर बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा 2024 ( Bihar Board Matric Exam 2024 ) के लिए सामाजिक विज्ञान (इतिहास) का सब्जेक्टिव प्रश्न उत्तर दिया गया है यदि आप लोग मैट्रिक परीक्षा 2024 की तैयारी कर रहे हैं तो कक्षा 10 यूरोप में राष्ट्रवाद का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न( class 10th europe mein rashtravad dirgh uttariy prashn ) यहां पर किया गया है जो कि आने वाले परीक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है साथ ही इस वेबसाइट पर सभी सब्जेक्ट का ऑब्जेक्टिव एंड सब्जेक्टिव प्रश्न( Bihar Board Class 10th All Subjective Ka Objective And Subjective Question 2024 ) दिया गया है जिससे आप 2024 में बेहतर तैयारी कर सकते हैं

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Matric History Long Subjective Question Answer 2024

प्रश्न 1. जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की क्या भूमिका थी? 

उत्तर ⇒ बिस्मार्क जर्मन डायट में प्रशा का प्रतिनिधि हुआ करता था और अपनी सफल कूटनीति का लगातार परिचय देता आ रहा था। वह निरंकुश राजतंत्र का समर्थन करते हुए जर्मन के एकीकरण के प्रयास में जुट गया। बिस्मार्क ने जर्मन एकीकरण के लिए ‘रक्त और लौह नीति’ का अवलंबन किया। उसने अपने देश में अनिवार्य सैन्य सेवा लागू कर दी। उसने अपनी नीतियों से प्रशा का सुदृढ़ीकरण किया। बिस्मार्क ने ऑस्ट्रिया के साथ मिलकर 1864 ई० में श्लेशविंग और हॉलस्टीन राज्यों के मुद्दे को लेकर डेनमार्क पर आक्रमण कर दिया, क्योंकि उन पर डेनमार्क का नियंत्रण था। जीत के बाद शेल्सविग प्रशा के अधीन हो गया और हॉलस्टीन ऑस्ट्रिया को प्राप्त हुआ। 1866 ई० में ऑस्ट्रिया ने प्रशा के खिलाफ सेडोवा में युद्ध की घोषणा कर दी और ऑस्ट्रिया युद्ध में बुरी तरह पराजित हुआ । इस तरह उसका जर्मन क्षेत्र से प्रभाव समाप्त हो गया और इस तरह जर्मन एकीकरण का दो-तिहाई कार्य पूरा हो गया ।

शेष जर्मनी के लिए फ्रांस से युद्ध करना आवश्यक था, क्योंकि जर्मनी के दक्षिणी रियासतों के मामले में फ्रांस हस्तक्षेप कर सकता था। 19 जून, 1870 ई. को फ्रांस के शासक नेपोलियन ने प्रशा के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और सेडॉन की लड़ाई में फ्रांसीसियों की जबरदस्त हार हुई 10 मई, 1871 ई. को फ्रैंकफर्ट की संधि के द्वारा दोनों राष्ट्रों के बीच शांति स्थापित हुई। इस प्रकार सेडॉन के युद्ध में ही एक महाशक्ति फ्रांस के पतन पर दूसरी महाशक्ति जर्मनी का उदय हुआ।

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प्रश्न 2. इटली के एकीकरण में मेजिनी, काबूर और गैरीबाल्डी के योगदान का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ इटली के एकीकरण में मेजिनी और काबूर के निम्नलिखित योगदान थे

मेजिनी—मेजिनी साहित्यकार, गणतांत्रिक विचारों का समर्थक और योग्य सेनापति था। मेजिनी संपूर्ण इटली का एकीकरण कर उसे एक गणराज्य बनाना चाहता था। जबकि सार्डिनिया पिडमीट का शासक चार्ल्स एलबर्ट अपने नेतृत्व – में सभी प्रांतों का विलय चाहता था। उधर पोप भी इटली को धर्मराज्य बनाने का पक्षधर था। इस तरह विचारों के टकराव के कारण इटली के एकीकरण का मार्ग अवरुद्ध हो गया था। कालांतर में ऑस्ट्रिया के हस्तक्षेप से इटली में जनवादी आंदोलन को कुचल दिया गया। इस प्रकार मेजिनी की पुन: हार हुई और वह पलायन कर गया।

1848 ई० तक इटली के एकीकरण के लिए किए गए प्रयास वस्तुतः असफल रहे, किन्तु धीरे-धीर इटली में इन आंदोलनों के कारण जनजागरूकता बढ़ रही थी और राष्ट्रीयता की भावना बढ़ रही थी । इटली में सार्डिनिया पिडमौंट का नया शासक विक्टर इमैनुएल राष्ट्रवादी विचारधारा का था और उसके प्रयास से इटली के एकीकरण का कार्य जारी रहा। अपनी नीति के क्रियान्वयन के लिए विक्टर ने काउंट काबूर को प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

काउंट काबूर—काउंट काबूर एक सफल कूटनीतिज्ञ एवं राष्ट्रवादी था। वह इटली के एकीकरण में सबसे बड़ी बाधा ऑस्ट्रिया को मानता था। अतः उसने ऑस्ट्रिया को पराजित करने के लिए फ्रांस की ओर से युद्ध करने की घोषणा कर फ्रांस का राजनीतिक समर्थन हासिल किया काबूर ने नेपोलियन III से भी एक संधि की, जिसके तहत फ्रांस ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ पिडमौंट को सैन्य समर्थन देने का वादा किया। बदले में नीस और सेवाय नामक दो रियासतें काबूर ने फ्रांस को देना स्वीकार किया।

1860-61 में काबूर ने सिर्फ रोम को छोड़कर उत्तर तथा मध्य इटली के सभी रियासतों को मिला लिया तथा जनमत-संग्रह कर इसे पुष्ट भी कर लिया। 1862 ई० तक दक्षिण इटली रोम तथा वेनेशिया को छोड़कर बाकी रियासतों का विलय रोम में हो गया और सभी ने विक्टर इमैनुएल को शासक माना।

गैरीबाल्डी – गैरीबाल्डी पेशे से एक नाविक था और मेजिनी के विचारों का समर्थक था परन्तु बाद में काबूर के प्रभाव में आकर संवैधानिक राजतंत्र का पक्षधर बन गया। उसने अपने सैनिकों को लेकर इटली के प्रांत सिसली तथा नेपल्स पर आक्रमण कर दक्षिण इटली के जीते गए क्षेत्र को बिना किसी संधि के विक्टर इमैनुएल को सौंप दिया। गैरीबाल्डी ने अपनी सारी सम्पत्ति राष्ट्र को समर्पित कर साधारण किसान की भाँति जीवन जीने की ओर अग्रसित हो गए।


प्रश्न 3. इटली तथा जर्मनी के एकीकरण में ऑस्ट्रिया की क्या भूमिका थी?

उत्तर ⇒ ऑस्ट्रिया इटली और जर्मनी के एकीकरण का सबसे बड़ा विरोधी था। ऑस्ट्रिया के हस्तक्षेप से इटली में जनवादी आंदोलन को कुचल दिया गया। ऑस्ट्रिया का चांसलर मेटरनिख पुरातन व्यवस्था का समर्थक था ऑस्ट्रिया को पराजित किए बिना इटली और जर्मनी का एकीकरण संभव नहीं था। अतएव काबूर ने ऑस्ट्रिया को पराजित करने के लिए फ्रांस के साथ मिलकर क्रीमिया युद्ध में भाग लिया और फ्रांस का राजनीतिक समर्थन प्राप्त किया। 1860-61 में काबूर ने सिर्फ रोम को छोड़कर उत्तर तथा मध्य इटली के सभी रियासतों (परमा, मोडेना, टसकनी, फब्बारा, बेलाजोना आदि) को मिला लिया। 1871 ई० तक इटली का एकीकरण मेजिनी, काबूर और गैरीबाल्डी जैसे राष्ट्रवादी एवं विक्टर इमैनुएल जैसे शासकों के योगदान के कारण पूर्ण हुआ।

जर्मनी के राष्ट्रीय आंदोलन में शिक्षण संस्थानों, बुद्धिजीवियों, किसानों, कलाकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। यद्यपि ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए दमनकारी कानून चार्ल्सवाद के आदेश को जारी किया, परंतु जर्मनी में राष्ट्रीयता की प्रबल धारा प्रवाहित हो रही थी, जिसने एकीकरण के काम को आगे बढ़ाने में सहायता प्रदान की। 1866 ई० में ऑस्ट्रिया ने प्रशा के खिलाफ सेडोवा में युद्ध की घोषणा कर दी और उसमें वह बुरी तरह पराजित हुआ। इस तरह ऑस्ट्रिया का जर्मन क्षेत्रों से प्रभाव समाप्त हो गया और प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण सम्पन्न हुआ, जिसमें बिस्मार्क की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।


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प्रश्न 4. यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों एवं प्रभाव का वर्णन करें।

अथवा, यूरोप में राष्ट्रवाद के प्रसार में नेपोलियन बोनापार्ट के योगदानों की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना के विकास में फ्रांस की राज्यक्रांति, तत्पश्चात् नेपालियन के आक्रमणों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। फ्रांसीसी क्रांति ने राजनीति को अभिजात्यवर्गीय परिवेश से बाहर कर उसे अखबारों, सड़कों और सर्वसाधारण की वस्तु बना दिया। यूरोप के कई राज्यों में नेपोलियन के अभियानों द्वारा नवयुग का संदेश पहुँचा नेपोलियन ने जर्मनी और इटली के राज्यों को भौगोलिक नाम की परिधि से बाहर कर उसे वास्तविक एवं राजनीतिक रूपरेखा प्रदान की, जिससे इटली और जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। दूसरी तरफ, नेपोलियन की नीतियों के कारण फ्रांसीसी प्रभुता और आधिपत्य के विरुद्ध यूरोप में देशभक्तिपूर्ण विक्षोभ भी जगा । राष्ट्रवाद ने न सिर्फ दो बड़े राज्यों के उदय को सुनिश्चित किया। बल्कि, अन्य यूरोपीय राष्ट्रों में भी इसके कारण राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हुई। हंगरी, बोहेमिया तथा यूनान में स्वतंत्रता आंदोलन इसी राष्ट्रवाद का परिणाम था। इसी के प्रभाव ने ओटोमन साम्राज्य के पतन की कहानी को अंतिम रूप दिया। बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रवाद के प्रसार ने स्लाव जाति को संगठित कर सर्बिया को जन्म दिया।

इस प्रकार, यूरोप में जन्मी राष्ट्रीयता की भावना ने प्रथमतः यूरोप को एवं अंतत: पूरे विश्व को प्रभावित किया जिसके फलस्वरूप यूरोप के राजनीतिक मानचित्र में बदलाव तो आया ही, साथ ही साथ कई उपनिवेश भी स्वतंत्र हुए।

यूरोप में राष्ट्रवाद के परिणाम :

(i) यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना के विकास के कारण यूरोपीय राज्यों का एकीकरण हुआ इसके कारण कई बड़े एवं छोटे राष्ट्रों का उदय हुआ

(ii) यूरोपीय राष्ट्रवाद के कारण ही यहाँ संकीर्ण राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। संकीर्ण राष्ट्रवाद के कारण प्रत्येक राष्ट्र की जनता और शासक के लिए उनका राष्ट्र ही सबकुछ हो गया। इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार थे बाल्कन प्रदेश के छोटे-छोटे राज्यों एवं विभिन्न जातीय समूहों में यह भावना जोर पकड़ने लगी।

(iii) यूरोपीय राष्ट्रवाद के प्रभाव के कारण जर्मनी, इटली जैसे राष्ट्रों में साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों का उदय हुआ। इस प्रवृत्ति ने एशियाई एवं अफ्रीकी देशों का अपना निशान बनाया जहाँ यूरोपीय देशों ने उपनिवेश स्थापित किये।


प्रश्न 5. जुलाई 1830 ई. की क्रांति की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ चार्ल्स दशम एक निरंकुश एवं प्रतिक्रियावादी शासक था, जिसने फ्रांस में उभर रही राष्ट्रीयता तथा जनतंत्रवादी भावनाओं को दबाने का कार्य किया। उसने अपने शासनकाल में संवैधानिक लोकतंत्र की राह में कई गतिरोध उत्पन्न किए। उसके द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री पोलिग्नेक ने पूर्व में लुई 18वें के द्वारा स्थापित ‘समान नागरिक संहिता’ के स्थान पर शक्तिशाली अभिजात्य वर्ग की स्थापना तथा उसे विशेषाधिकार से विभूषित करने का प्रयास किया। उसके इस कदम को उदारवादियों ने चुनौती तथा क्रांति के विरुद्ध षडयंत्र समझा। प्रतिनिधि सदन एवं दूसरे उदारवादियों ने पोलिग्नेक के विरुद्ध गहरा असंतोष प्रकट किया। चार्ल्स दशम के इस प्रतिरोध के प्रतिक्रियास्वरूप 25 जुलाई 1830 ई० से गृहयुद्ध आरंभ हो गया। इसे ही जुलाई 1830 ई० की क्रांति कहा जाता है। परिणामतः चार्ल्स X को फ्रांस की राजगद्दी त्यागकर इंग्लैंड भागना पड़ा और इस प्रकार फ्रांस में बूब वंश के शासन का अंत हो गया।

फ्रांस में 1830 ई. की क्रांति के परिणामस्वरूप बूब वंश के स्थान पर आयेंस वंश को गद्दी सौंपी गई।

इस वंश के शासक लुई फिलिप ने उदारवादियों, पत्रकारों तथा पेरिस की जनता के समर्थन से सत्ता प्राप्त की थी। अतएव उसकी नीतियाँ उदारवादियों के पक्ष में तथा संवैधानिक गणतंत्र की स्थापना करना था।


प्रश्न 6. यूनानी स्वतंत्रता आंदोलन का संक्षिप्त विवरण दें।

उत्तर ⇒ फ्रांसीसी क्रांति से यूनानियों में राष्ट्रीयता की भावना की लहर जागी, क्योंकि धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर उनकी पहचान एक थी। फलतः तुर्की शासन से अलग होने के लिए आंदोलन की शुरुआत हुई। इसके लिए इन्होंने हितेरिया फिलाइक नामक संस्था की स्थापना (ओडेसा नामक स्थान पर) की। इसका उद्देश्य तुर्की शासन को यूनान से निष्कासित कर उसे स्वतंत्र बनाना था। क्रांति के नेतृत्व के लिए यूनान में शक्तिशाली मध्यम वर्ग का उदय हो चुका था।

यूनान सारे यूरोपवासियों के लिए प्रेरणा एवं सम्मान का पर्याय था। इंग्लैण्ड का महान कवि लार्ड वायरन यूनानियों की स्वतंत्रता के लिए यूनान में ही शहीद हो गया। इससे यूनान की स्वतंत्रता के लिए संपूर्ण यूरोप में सहानुभूति की लहर दौड़ने लगी। उधर रूस भी अपनी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षा तथा धार्मिक एकता के कारण यूनान की स्वतंत्रता का पक्षधर था।

यूनान में विस्फोटक स्थिति तब बन गई, जब तुर्की शासन द्वारा यूनानी स्वतंत्रता संग्राम में संलग्न लोगों को बुरी तरह कुचलना शुरू किया गया। 1821 ई० मे अलेक्जेंडर चिपसिलांटी के नेतृत्व में यूनान में विद्रोह शुरू हो गया। रूस का जार अलेक्जेंडर व्यक्तिगत रूप से तो यूनानी राष्ट्रीयता के पक्ष में था। परन्तु, ऑस्ट्रिया के प्रतिक्रियावादी शासक मेटरनिख के दबाव के कारण खुलकर सामने नहीं आ पा रहा था। जब नया जार निकोलस आया तो उसने खुलकर युनानियों का समर्थन किया। अप्रैल 1826 ई० में ग्रेट ब्रिटेन और रूस में एक समझौता हुआ कि तुर्की-यूनान विवाद में मध्यस्थता करेंगे। 1827 ई. में लंदन में एक सम्मेलन हुआ जिसमें इंग्लैंड, फ्रांस तथा रूस ने मिलकर तुर्की के खिलाफ तथा यूनान के समर्थन में संयुक्त कार्रवाई करने का निर्णय लिया। इस प्रकार तीनों देशों की संयुक्त सेना नावारिसों की खाड़ी में तुर्की के खिलाफ एकत्रित हुई। तुर्की के समर्थन में सिर्फ मिस्र की सेना आई। युद्ध में मिस्र और तुर्की की सेना बुरी तरह पराजित हुई फिर अन्ततः 1829 ई. में एड्रियानोपुल की संधि हुई, जिसके तहत तुर्की की नाममात्र की प्रभुता में यूनान को स्वायत्ता देने की बात तय हुई। परन्तु यूनानी राष्ट्रवादियों ने संधि की बातों को मानने से इनकार कर दिया। उधर इंग्लैण्ड और फ्रांस भी यूनान पर रूस के प्रभाव की अपेक्षा इसे स्वतंत्र देश बनाना बेहतर मानते थे। फलतः 1832 ई में यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया। बबेरिया के शासक ओटो को स्वतंत्र यूनान का राजा घोषित किया गया।


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प्रश्न 7. लेनिन के जीवन एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डालें ।

उत्तर ⇒ बोल्शेविक क्रांति (नवम्बर 1917) में रूस के राजनीतिक मंच पर लेनिन का प्रादुर्भाव हुआ। लेनिन एक कुशल सामाजिक चिंतक तथा व्यावहारिक राजनीतिज्ञ था। जार की सरकार ने उसे रूस से निर्वासित कर दिया था। जब मार्च 1917 ई. में क्रांति हुई, वह जर्मनी की सहायता से रूस पहुँचा। लेनिन ने तीन नारे दिए थे भूमि, शांति और रोटी लेनिन । ने बल प्रयोग द्वारा करेन्सकी सरकार को उलट देने का निश्चय किया। सेना और जनता दोनों ने उसका साथ दिया। 7 नवम्बर 1917 ई० को बोल्शेविकों ने सत्ता अपने हाथों में ले ली और शासन की बागडोर लेनिन के हाथों में आ गई । लेनिन ने ट्रॉटस्की के नेतृत्व में विशाल लाल सेना गठित की तथा आंतरिक विद्रोह को दबाने के लिए चेका नामक गुप्त पुलिस संगठन बनाया। 1918 में विश्व का पहला समाजवादी देश रूस का संविधान बना और रूस ‘सोवियत समाजवादी गणराज्यों के समूह’ (USSR) में परिवर्त्तित हो गया । लेनिन ने 18 वर्ष से अधिक उम्रवाले सभी नागरिकों को मताधिकार प्रदान किया। 1921 में नई आर्थिक नीति (NEP) की घोषणा की गई। 1924 ई० में लेनिन की मृत्यु हो गई ।


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Chapter Name Objective Que Subjective Que Long Subjective
1. यूरोप में राष्ट्रवादClick HereClick HereClick Here
2. समाजवाद एवं साम्यवाद Click HereClick HereClick Here
3. हिंद – चीन में राष्ट्रवादी आंदोलनClick HereClick HereClick Here
4. भारत में राष्ट्रवादClick HereClick HereClick Here
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